Sunday, July 1, 2012

मेरी ये जिद....

ख्वाब से बुलंदियों तक जो सड़क जाती है न.,,
तुम उसपर मिलना मुझे 
मेरा हौंसला बनकर ...|
प्यार न सही ,...नफरत ही सही 
दिल में कुछ तो रखना ..||
उम्मीद के दीये न जले,
तो धिक्कार के अंधेरो को ही महफ़ूज कर लेना आँखों में 
कम से कम 
कोई न कोई रिश्ता सांस लेता रहेगा  ...
ताकि जब कभी मैं पहुँचूँ ..
बुलंदियों के उस शहर तक  ..
और पलट कर देखूं 
तो वहम ही सही ,पर ये लगता रहे 
कि मेरे इस सफर में तुम मेरे साथ ही थे ....||
 मेरी मोहब्बत आखिर तक जिंदा रही
 मेरा ये गुमान टूटना नहीं चाहिए ||
अगर ये मेरा गुरूर है तो पनपने दो इसे 
जिद है तो जूझने दो मुझे खुद से ही...
मेरी ये जिद ही मेरे वजूद की वजह है ...
खुद को खोकर, खुद को पाने के बीच का सफर है 
चलने दोमुझे, मेरी जिंदगी को , ऐसे ही..||

और हाँ ,किसी की निगाहों में 
गर ये गलत है ..
तो इस बार गलत ही सही...
सब कुछ सही होता रहे तब भी तो , जिंदगी
-- जिंदगी नहीं रह जाती...||
                  -अनजान पथिक 


Saturday, June 30, 2012

चल चलें ,चाँद के पार चलें...


चल चलें ,चाँद के पार चलें...
आ जा हमदम एक बार चलें 

बर्फीली मस्त हवाओं के पंखों पे रात ये गुज़रे जब ...
एक ख्वाब की कश्ती ,आँखों के बहते दरिया में उतरे जब....
तब जुल्फें खोले ,बिन कुछ बोलें ..
आ थम जा इन बाहों में...
तारों के फूल है खिले वहाँ  
बादल के गाँव है राहों में...
आ वक्त की इस सारी बंदिश से ,दूर मेरे इकरार चलें ..
चल चलें चाँद के पार चलें ...
आ जा हमदम एक बार चलें...||


उस फलक को करके पार वहाँ ,चलते हैं ऐसे  देस ..सनम ....
जहाँ तितली तितली ,पत्ता पत्ता ,खुशबू खुशबू बस होंगे हम.....
जहाँ हवा मोहब्बत गायेगी,बारिश भी इश्क सुनाएगी .
जहाँ लैला बनकर रात -सहर के मजनूँ में ढल  जायेगी  ..

जहाँ सही न हो ,न गलत हो कुछ.,आ वहाँ मेरे दिलदार चलें...
चल चलें ,चाँद के पार चलें...
आ जा हमदम एक बार चलें ...||

  
जहाँ धूप के पीले पन्नों पर ,हम रोज नया इक राज़ लिखें..
इबादत ,ख्वाब ,हकीकत 
प्यार के सब के सब अंदाज़ लिखें ...

और हो जायें दीवाने यूं ,कि वक्त थके ,धडकनें थमें.
खुद खुदा रोक दे जब सब कुछ  ,तब भी अपना ये प्यार चले ..
सदियों तक रूह तके तुझको ,
सदियों तक ये दीदार चले ....
दिल कभी न जीते तुझसे ,बस, इतनी लंबी ये हार चले 
चल चलें ,चाँद के पार चलें...
आ जा हमदम एक बार चलें ...||













Sunday, June 24, 2012


आसमान के आगे भी दुनिया तो होती होगी
ये ज़मीन भी माँ बताओ न ,कभी तो रोती होगी ..!!!
सूरज को स्कूल बताओ ,कौन छोड़ने जाता .???
चंदा रात से 'tution ' पढ़ने रोज चला क्यों आता ..??
पेड़ों को ये हरी हरी सी ड्रेस है कौन सिलाता ,
नन्हे नन्हे तारों को जूते है कौन पहनाता ..??
ये शाम सुबह दोनों घर पर एक साथ क्यों नहीं आते ..??
हम पहले बूढ़े ,बाद में क्यों न बच्चे फिर बन जाते ..??
फलक के छज्जे पे बादल के कपडे किसने डाले ..??
और इनको निचोड़ इनसे फिर बारिश कौन निकाले..!!
हवा को बिन पंखों के माँ उड़ना है कौन सिखाता ..!!
सूरज को क्यों कभी भी माँ ,बुखार नहीं है आता ..
अखबार को सारी खबरें जाकर रोज है कौन सुनाता ...??
फूलों के डिब्बों के अंदर खुशबू के biscuit कौन छिपाता..??
काँटों का इतना मूड खराब माँ कौन किया करता है..
आसमान इतना लंबा तो क्या 'complan' पिया करता है ...
नदियाँ माँ बचपन में पोलियो ड्रॉप नहीं है पीती ...
इतनी टेढ़ी मेढ़ी होकर भी फिर कैसे है वो जीती...
माँ पेट बड़ा सिर से मेरा ,फिर दिमाग नहीं क्यों इसमें..
दिमाग ये कैसा fridge है ,यादें कभी न सड़ती जिसमें....
आसमान के कनवास पर ये पेंटिंग कौन है करता ..
पेड़ों की गुल्लक में ,पत्तों के सिक्के कौन है भरता .....
वक्त के लम्हे सारे क्यूँ आपस में खुद से भागे ..
एक जो रहता पीछे तो दूजा क्यों निकले आगे .....

धुप छाँव के जैसे माँ यारी है कैसे होती....??
कितना अच्छा होता जो ,दुनिया एक गाडी होती...
हम तुम रोज़ बैठ माँ उसपर दूर दूर तक जाते
ऐसे कितने ही सवाल के पेड़ हम रोज़ उगाते ......
फिर जब थक जाता मैं तो गोद में तेरे आता ...
फिर तू लोरी गाती माँ ,और फिर से मैं सो जाता...........||
 

Sunday, May 13, 2012

frnds forever.....

वक्त का पानी गुज़रता है जब ,
उम्र के किनारों को काटते हुए
तब कतरा –कतरा ,लम्हा –दर लम्हा ही सही
ये उम्र बहती जाती है
उस पानी के इशारों पर ,उसी की धुन में
उसी की लय में .......
ऐसा ही कुछ सफर है हम सबका .........||


मेरे इसी सफर में याद करो ..
किसी एक मोड पर ,कभी तुम भी आकर मिले थे मुझसे
एक अनजान दरिया ,एक बेनाम नदी की तरह
अपनी अलग धुन ,अपनी अलग लय लिए ...
और तबसे साथ साथ ही बहते रहे हम दोनों ...
हमारे किस्से ,हमारे लम्हे ,हमारे फ़साने
एहसास दर एहसास एक दूसरे में सिमटते हुए..
एक दूजे को समझते हुए ....

पर अब लगता है जैसे ये साथ शायद और नहीं ,,
इस मोड से चुननी होंगी हमें अपनी अपनी दिशाएं ,अपनी अपनी राहें
इसलिए चाहकर भी रोकूँगा नहीं तुम्हें ...
बस एक वादा लूँगा ,
और एक वादा निभाऊंगा ..
कि हम कितना भी दूर निकलें ,कितना भी अलग चलें..
मेरे संग बीता हुआ ये सफर ,ये सारे पल ..
तुम भूलोगे नहीं ..

वादा करता हूँ ,,
वक्त को लांघकर एक न एक दिन मिलने आऊंगा तुमसे ....
इंतज़ार करना .....!!!!!!!!!!!

Thursday, May 3, 2012

मैं और मेरा कमरा .....

एक रिश्ता फिर से गिनने लगा है ,,,, आखिरी सांसें...||
करवटें लेने लगी है
फिर से नयी खामोशियाँ ..
मेरे और मेरे कमरे के बीच ...||
चेहरे उतरने लगे हैं ..दीवारों के...,,
मायूसी में सिमटे रहते है दरवाजे ...||
उदास सी रहने लगी है खिड़कियाँ ,
मेज ,कुर्सियों पे जैसे सोते रहते है सन्नाटे ,
बेड ऐसा लगता है जैसे ..
सहारा देना वाला कोई कंधा ..
जिसके मन में ये शिकवा
शायद कुछ दिन बाद फिर न मिलेंगे कभी . ...

पंखा उदास होकर, धुत्त हो नशे में ...
खुद से भागा करता है ...दिनभर ||
घडी की सुइंयाँ कदम कदम पे
जैसे भरने लगी है आहें ..|
अलमारियाँ अपने चेहरे को
अपने दरवाज़ों के हाथों के पीछे छिपाकर
जैसे सुबकती हैं दिन भर ...||
किताबें परेशां इसलिए ..
कि कौन सोयेगा उनपर
उनको तकिया बनाकर ..???

हर एक चीज़ लगता है ..
जैसे जुडी हो मुझसे ..कई सदियों से ...
हवा का हर एक कतरा ..
जैसे जानता हो मुझको ,मेरी रूह से भी ज्यादा ...
कोनों में सिकुड़े,मुड़े तुड़े ही सही
पर बिखरे होंगे शायद मेरे कई राज़ ..
जो अकेले में बांटे सिर्फ तुमसे....

जिन्हें तुम्हारे पहलू में महफूज़ कर जाऊंगा मैं ..||
उदास न हो मेरे ए हमसफ़र ..
तुमको याद रखूंगा इन सब चीज़ों की खातिर ..
और फिर कई सालों बाद
जब खोलूँगा फिर से किताब-ए-जीस्त (जिंदगी की किताब )
और चूमेगा तुम्हारा ज़िक्र मेरे होठों को ...
तब फिर से तुम्हे एक नगमे में सजाऊंगा मैं...||

ऐ मेरे कमरे ..
तुम मुझे याद तो बहुत आओगे ....||


Monday, April 23, 2012

भूख --एक सपना ..,हकीकत सा....



ए मेरे चंदा ,कर दो तुम कुछ ऐसा 
कि आज बाद तुमको केवल पूजता रहूँ 
मत रात भर जागो 
मत बांटो चाँदनी 
रहने दो रात को अकेला ,तनहा ...
सन्नाटों के कंधे पे भी,,,, सिर तो रख सकती है वो ...
वो कह सकती है अँधेरे सेमुझको बाहों में भर लो..||

पर  उतरो मेरी ज़मीं ,
देखो ये सहमी सडकें ,ये ऊंघती गली .....
इनमें जागते है कुछ बच्चे 
जो रात भर तकते हैं तुमको ,
भूखी निगाहों  से .
सिकोडें पैरों को ..
समेटे पेट में कई परतें भूख की  ...
लगाये यही  आस  
कि आज चाँद उतरेगा 
रोटी का एक टुकड़ा  बनकर ..||
और फिर सदियों बाद ..
कोई नर्म नर्म हाथों से सहलायेगा वो पेट 
जिनको मालूम ही नहीं ..
"पेट भरना" होता क्या ....????


उनसे कुछ न कहना तुम ..
कोई खिलौना मत देना ..
उनको कौवा ,हाथी ,घोडा इन सबका हवाला देकर भी मत खिलाना तुम..
जैसे खिलाती थी तुम्हारी नानी ,माँ,और दादी  ...||
बस प्यार से खुद को परोस देना ,
 रोटी का टुकड़ा बनाकर ,
वो जिंदगी समझकर खा लेंगे ....

ज्यादा शौक करने की आदत नहीं होती उनको ...||

बस दिला दो उन्हें यकीं ..
कि उनके लिए भी यहाँ जीता है कोई ...||
बस एक एहसास कि जब सोते है वो  
रात में ..भूखे पेट 
तब चाँद आता है... सपनों में उन्हें खाना खिलाने ..
रात आती है लोरी सुनाने ...
और चहरे पे हलकी थपकियाँ देती है ये जिंदगी ..
जिससे  मुस्कुराएं वो,सुकूं से सो जायें वो ...


....ताकि कोई भी मेरी सड़क ,
मेरी गली ,मेरी ज़मीं  ...
कभी फिर भूखा न सोये...||
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ए मेरे चंदा 
 बस कर दो तुम कुछ ऐसा...
ताकि जिंदगी भर केवल तुमको पूजता रहूँ....|| 

Tuesday, April 3, 2012

हाथ के पिंजड़े में 
कैद कर रखी है किसीने 
तकदीर सबकी ..||
एक शिकारी है 
जो जानता है सबकी कमजोरियां 
जो जानता है
कैसे मजबूर करना है किसको ..??
लकीरों की बेड़ियों से बाँध रखता है वो 
तडपती ,मचलती उन तकदीरों को 
जिन्होंने ख्वाब देखा था कभी 
आज़ाद हवा को चूमकर,
हर् फिजा में अपनी कामयाबी की खुशबू घोलने का ||

आज याद आया ...
मैं इस तकदीर को ही आज़ाद कराने आया था 
ज़मीं पे ...
यही तो मकसद था मेरा 
वरना तो,
सुकूं 
जन्नत में भी कम नहीं ...||