Monday, August 13, 2012

सौदा...

उम्मीद के सिक्के जेब में  भरकर 
वक्त की बाज़ारों में निकला ......  ..
सोचके ये .....
कोई सही सी दिखे दुकां (दूकान) जो   ....
थोड़े वक्त के पाक से लम्हें ले लूँगा मैं...
फिर उनको तेरे साथ जियूँगा ...||

पर आज भी चेहरे पर मायूसी लेकर  ..ही लौटा हूँ ...

मुट्ठी भर भी नही मिले पल.....
तुमको देखूं  ,तुमको सोचूं ,
तुमको पा लूं.,या फिर खो दूं 
 या फिर तुमको जी ही लूं....
इतने ज़रा से ....वक्त में, बोलो .....??

 "हर एक ..बात के लिए मेरी जाँ, एक पूरी सी  सदी भी कम है..||"
 
आज समझने लगा हूँ ...ये कि
सच कहते है शायद लोग ..जो  कहते है ये  ....

"ज़माने में महँगाई बहुत है ....."||

                                                  -अनजान पथिक 


Sunday, August 12, 2012

"तुमसे बात "

सुनो ...
एक बात कहूं मैं !!...
ये जो एक लम्बी सी चादर है ना ...
फासले की ...
मेरे दिल से तेरे दिल तक
..आओ इसे ..समेट ले ..थोड़े वक़्त की खातिर 
एक सिरे से तुम पकड़ो 
एक सिरे मैं हाथ लगाऊं .....||
फिर जब ...वक्त दोबारा करने लगे शिकायत ..
फिर से..इसे तान देंगे...||

फिर से उतनी दूर चले जायेंगे ....
जैसे...
एक दूजे के कभी ना थे....
"ये तो हम पहले भी करते आये है ना .."||

बोलो ,,,,क्या दिक्कत है...??
"और वैसे भी हम अलग कहाँ हो पाते ही हैं....!!!!"
                                   -अनजान पथिक ......

पतंग ...



                                                              

पतंग की तरह आसमाँ में दिन भर उड़ता रहा इक सूरज
किस छत से ,,किस डोर से,,किस छोर से...
ये मालूम नहीं... 
मांझा खीच, कभी फलक पे ऊपर तान देता कोई 
तो कभी ढील देकर नीचे कर देता था कोई ...
मज़े मज़े में...||
****
पर अब तो शाम भी  चढ़ आयी है छत पर ..
हाथ में चाँद की पतंग लिये ...
लगता है फिर पेंच लड़ेंगे...!!!!
सुना हैं ..बड़ा तेज़ है .मांझा- चाँद का....
रोज़ पतंग कट जाती है सूरज वाली ...
और कुछ आवारा से ..क्षितिज
नंगे पाँव ही दौड़ जाते  हैं लूटने.उसको ..
..........
आज ज़रा काम है कम  .....
तो मैं भी फुरसत में खड़ा हूँ छत पर,
बस इस  इंतज़ार में  ..
कि..शायद जो पेंच लड़े गर आज ....
और कटे जो सूरज फिर से ...
गुज़रे मेरी गली या छत के ऊपर से ..
तो ..लंगड़ डाल के..,उछल -उचक के.. ..
कैसे भी ...मैं लूट लूँ शायद...
बहुत ज़माना बीता मुझको भी अब तो पतंग उडाये.....
"बड़े शहर में वैसे वरना कहाँ पतंगें उड़ती ही  हैं..???." 
                                                -अनजान पथिक..

Tuesday, July 24, 2012

कागज़ पे कुछ लिखकर 
मिटा कर देखा है कभी....??
कागज़ तो फिर से कोरा हो जाता है ...
मगर उसकी उधड़ी हुई सतह को याद रह जाते हैं 
लफ़्ज़ों के साथ गुज़रे वो पल...
जो कितना भी वक्त बीते ...,उतर नहीं पाते कभी 
कागज के नर्म ज़हन से ....||

कुछ ऐसा ही होता है ....
दूरियों से जुड़े दो दिलों का रिश्ता ....
वो (..खुदा ) लाख मिटाता रहे 
एक को दूजे की किस्मत से..जिंदगी से...
मगर दिल के नर्म कागज से,
न एहसास मिटते हैं कभी ...,न ही जज़्बात उतरते ......| 

कुछ रिश्ते खुदा भी शायद इसलिए ही बनाता है 
कि कुछ तो हो काश,, जिसकी इबादत वो भी कर सके ...,
जिसके सजदे वो झुक सके ..||

आओ आज ऐसे ही, अपने इक रिश्ते को जिया जाए...||

                                           -अनजान पथिक  

Saturday, July 21, 2012

एक शहर मोहब्बत का


           
एक रात गुज़रती है ,...रोज 
फलक की कच्ची पगडंडियों से होते हुए ;  
हाथ में चाँद का चराग(चिराग) लिए .... ,
पैरों में सन्नाटे की पायल पहने ...
अँधेरे के जंगलों से निकलकर,....
दूर ,बहुत दूर ..... जाती है वो   
इक आवारा सुबह से मिलने...
किसी अनसुने ,अनदेखे से शहर में...||  

एक शहर जहाँ ,मोहब्बत का सूरज कभी ढलता नहीं...
एक शहर जहाँ ,खेतों में इश्क की फसल उगा करती है ...
जहाँ नीला सा ये आसमां..... पिघलकर घुल जाता है ,
शाम को,,,,, धरती की बांहों में ...
जहाँ डालियों पे, यादों के फूल महकते रहते है ...|
बीते लम्हें,  .... तस्वीर बनकर चढ़े रहते है ,
मंज़र की दीवारों पर...,उतरते नहीं कभी ... |
एक शहर जहाँ वो नदी भी बहती है ..
जो शीरी के लिए .....बनायीं थी ..इक फरहाद ने ..कभी 

एक शहर ,जहाँ  वक्त अपाहिज है ... चल नहीं पाता..
इसलिए यहाँ ....दिन गुज़रते नहीं ,रातें  होती नहीं ...
बस उसी एक लम्हे में जिंदा रहते है  सब लोग 
जिस एक लम्हें में उन्हें मोहब्बत हुई .....,
वो मोहब्बत ,जो सदियों से अब तक बदली नहीं ...|

कहते हैं ,ये वो शहर है ...
जो किसी हीर ने बसाया था किसी रांझे के लिए ...
ताकि मोहब्बत के सारे रिश्ते जिंदा रह सकें....||
 आज ख़्वाबों  में  निकलूंगा मैं ....... तुमसे मिलने के लिए ,

इसी एक शहर में ...इस यकीन पर  ..
कि कुछ भी हो जाये, कभी न कभी 
तुम मुझसे मिलने  जरुर आओगे ....
**बोलो आओगे न..???? **
                                           -अनजान पथिक 


Saturday, July 7, 2012

मुक्तक

अदाओं की ये दौलतें , पास ही रख लीजिए 
नुमाइश के बाजारों में दिल ,यूं ही नहीं बेचे जाते .............

यादें,लम्हें,रिश्तें ,खुशियाँ ये सब संजोनी चाहिए 
महबूबा-ए-वक्त के ये खत , यूं ही नहीं फेंके जाते ,,,

हो खुद का हुस्न देखना , तो मेरी नज़र रख लीजिये 
इन आइनों के दलालों से सच ,यूँ ही नहीं देखे जाते ..

खुदा महज़ कहना नहीं ,मानना भी पड़ता है 
इश्क के मज़हब में ये सिर ,यूँ ही नहीं टेके जाते ...

मेरे इकरार को मजबूरियाँ समझे जो मेरा यार गर 
कह दो उसे कि चाँद पर पत्थर नहीं फेंके जाते ...

दिल से जुड़ने वालों से बस इक हुनर सीखा करो 
नज़रें समझी जाती है ,चेहरे नहीं देखे जाते ....

ये हिन्दू मुस्लिम सिख का चर्चा अब ज़रा ठंडा करो
खुद्गर्ज़ियों की आँच पर  ,मसले (समस्याएं )नहीं सेंके जाते ...


Monday, July 2, 2012


इस चेहरे के पौधे को 
सींचते रहना  मुस्कानों के पानी से,..
बहारों के इंतज़ार में कहीं ये न हो ...
इसकी खुशबुएं सिमटी ही रह जायें 
......
क्योंकि बाकी बातें अपनी जगह है...
पर ये  पौधा जब खुल के, लहराकर
खुद की जिंदगी पर इतराता है न....
सच मानो ...
वक्त की ये धूप सजदे में झुक जाती है ..
जिंदादिली की हवाएं तड़प जाती है उसे छूकर गुजरने को 
गुमनामियों की बारिश जड़ों तक जाकर क़दमों पे सर रख देती है...
...
कभी मुस्करा के देखना .,सिर्फ अपने  लिए
बिना किसी शर्त ,बिना किसी वजह के ...
पता चल जायेगा ....
मैं क्यों हमेशा कहता था...
''मुस्कराते रहना''.....||
     -अनजान पथिक