Tuesday, April 19, 2011

एक चाँद देखा मैंने ......



एक चाँद देखा मैंने ,
     
बिन चाँदनी तड़पता|
तन्हाई में ,गुमसुम सा
    
आसमाँ में भटकता.......

है आज पूरा गोल वो,
लगता है सेहरा बाँधकर ,
कुछ कहने किसीको आया है..
या फिर खुद चाँदनी ने चुपके से उसे बुलाया है...???

मायूस सा फिरता है, तारों के उस शहर में ,
उन बेगानों की भीड़ में कोई अपना कहाँ मिलेगा ???
जो थामे हाथ हर मोड़ पर ,हर पल जो संग चलेगा.........

ये सब तो बस आवारा है ,
जाते है रात बितानेइस आसमाँ की छत तले...|
सुबह होते ही इन सबको निकल जाना है ..
तो फिर इन गैरों से क्या दिल लगाना है...

बस बादलों की चादर से
खुद को ज़रा सा ढककर,
कोशिश थी की उसने ,
फलक के तकिये पे सिर रखकर ,
कि नींद  के बहाने आये फिर से उसका सपना ..
जिसको कहा है उसकी धड़कन ने उसका अपना....

मन में थी कुछ तड़प..
आँखों में आसूँ  भी थे
कुछ चेहरे पे निशा उसकी उदासी के भी थे |
जो लगता था दूर से कि ,उसके चेहरे पे दाग है बड़े ..
वो आज देखा मैंने कि रोया है वो इतना
अपनी चाँदनी की तड़प में
कि आँखों के नीचे उसकी काले घेरे हैं पड़े.....

कोई चाँदनी से कह दे,कि है कोई आवारा..
जो बस उसी की खातिर, फिरता है मारा -मारा
जो ख़ामोशी से हर रात उसकी राहों को तकता है
उसकी हर आहट,हर हरकत पे, जिसका दिल वो धड़कता है....
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तभी सुबह के हाथों ने इन गालों को  थपथपाया
जब तक मै कुछ समझता,
सूरज था निकल आया||
हुआ एक और क़त्ल ..
एक रात फिर से जल गयी..
कुछ कहने की वो आरज़ू
 
कश्मकश में ही  पिघल गयी...

है फिर भी ये भरोसा ,ये  फिर भी  आरज़ू है
जो आज हुई सुबह ,तो कल फिर से रात होगी
जो आज रह गयी अनकही अनसुनी,
तेरे मेरे दरमियान, कल फिर से वही बात होगी....


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